“टीके वाली”

“टीके वाली”

कनिका के हाथ में आज का समाचार पत्र था। एक न्यूज़ पढ़ते ही उसने घबरा कर समर को आवाज लगाई…

“हम बच गए समर! हमें ना जाने कैसे उस रात नशा नहीं हुआ। नहीं तो हम भी रंगों की चकाचौंध देखने की चाह में इसकी तरह बर्बाद हो जाते। पढ़ो यह–”  कहते हुए उसने समाचार पत्र समर को थमाया और लंबी सांस भरकर ऐसे भाव दिखाएं मानो कोई एक्सीडेंट होते- होते वो बच गए हों।

समाचार- पत्र के भीतर वाले पेज पर” टीके वाली” हैडिंग से  एक खूबसूरत लड़की की तस्वीर थी— जो स्वयं को टीका लगा रही थी। उसका नाम “टीके वाली” पड़ गया था। समर ने देखा वह महक थी। उसके साथ लिखा था—” नशे की दलदल में फंसी ऐसी कई कुंवारी और ब्याहता हैं। जिन्हें उनके प्रेमियों और विदेशों से आए पतियों ने नशेड़ी बना कर छोड़ दिया है। पंजाब की जवान पीढ़ी विदेश जाने की ललक में इस बीमारी से ग्रस्त हो रही है। इन्हें सुधार ग्रहों में रखकर ठीक किया जा रहा है।”

समर ने यह सब पढ़ते ही कनु को गले से लगा लिया मानो वे किसी दलदल में धंसने वाले थे और अब उसका  नामोनिशान  नहीं रहा ! बल्कि वहां एक रूहानी आभा बरस रही थी जिसके प्रकाश में वह दोनों नहा रहे थे।  उनका दिमाग अतीत में भटकने लग गया था। जीवन की पिछली कुछ शामों की स्मृतियों में वे डूबने-उतराने लग गए थे । जब उनको अपने शौक के अलावा कुछ दिखाई नहीं देता था। समर की बेहिसाब यह चाहत कि मैं अपनी पत्नी को अपने दोस्तों की पत्नियों से हटकर दुनिया की सबसे ज्यादा ऐश कराऊंगा—कुछ नया करने की उसने ठान ली थी।

कनु और समर की नई-नई शादी हुई थी तो सब मेहमानों के जाने के कुछ ही दिनों के बाद कनु को जीवन की सारी खुशियां देने की चाह में समर ने एक नया ही सिलसिला शुरू कर लिया था। वह फैक्ट्री से शाम को घर आकर फ्रेश होता और कनु को धीरे से कान में कह देता कि मैं बाहर कार में जाकर बैठता हूं तुम सब सामान लेकर वहीं आ जाना।

आते हुए मां जी को आवाज देकर उनका हाल-चाल पूछ लेता था। उम्र की वार्ध्यकता और डायबिटीज के कारण वे पलंग पर लेटे- लेटे उसका इंतजार करती रहती थीं। कनु के आ जाने से उनकी दवाइयों की चिंता अब वही करती थी। दोनों बेटियां तो ससुराल में थीं, अपने परिवार में सुख-शांति से। मां जी को तो सारा दिन इस एक घड़ी का इंतजार रहता था जब वे अपने बेटे को मिलती थीं और आशीषों की बारिश से वातावरण को देवालय सा सुरभित कर देती थीं। उनके ज़हन में दादी बनने का चाव घर कर गया था, अब हर दिन वे यही रट लगाए रहती थीं। जबकि इन दोनों को ऐसे आशीर्वादों से अभी कुछ लेना-देना नहीं था।

      समर याद कर रहा था कि उसे तो हर शाम सांझ गहराने का इंतजार होता था। वह अपनी पत्नी को आनंद से भरपूर अनोखी लाइफ़ देना चाहता था, उसी धुन में उसने एक नया सिलसिला शुरू कर लिया था। कनु भी बेसब्री से समर के आने की बाट जोहती थी और फ्रैश हो कर उसके बाहर जाते ही वह  भी एक बैग में शराब की बोतल और दो गिलास ,साथ में बर्फ की एक ट्रे फ्रिज से निकाल कर बाहर कार में जाकर समर के पास बैठ जाती थी। जाने से पूर्व वह छोटू नौकर को हिदायत दे देती थी कि मांजी को खाना खिला कर नींद की गोली भी साथ दे देना हम एकाध घंटे में आते हैं, तब तक वह टीवी देखे। समर कार में बैठा होता था और वह बाईं ओर का गेट खोलकर कार में समर की बगल में बैठ जाती थी। बहुत ही फिल्मी स्टाइल था इनका।

उसके बैठते ही समर कार स्टार्ट करता था और घर की दीवार के पीछे दो घने पेड़ों के बीच जाकर कार रोक लेता था । वहां काफी अंधेरा होता था रोशनी उन तक पहुंचे ऐसे कोई दरीचे भी वहां नहीं थे। पिछवाडे़  के कारण आमूमन वहां कोई आता जाता भी नहीं था। असल में समर चाहता था कि वह दोनों अपने आप में ही मस्त रहें और दोस्तों के साथ तो एकदम नहीं । बड़ी बात यह थी कि वह घर में भी नहीं बैठना चाहता था– क्योंकि पीने वाले के घर में बिन बुलाए दोस्त आने लग जाते हैं। समर को यही रास्ता पसंद आया और मस्ती में जीवन गुजार रहे थे दोनों। कनु को भी उसने थोड़ा- थोड़ा पीने की आदत डाल दी थी।

फैक्ट्री से आते हुए समर कभी चिकन टिक्का ,फिश या पनीर टिक्का बाजार से ले ही आया करता था, सो उनका  सेशन पूरा चलता था। जाम से उसकी लंबी साझेदारी थी और अब कनु भी उस साझेदारी में आ गई थी। अपने-अपने ढंग से जीवन के कर्तव्य निभाते हुए दोनों को हर शाम का इंतजार रहने लग गया था लेकिन घर में कोई रिश्तेदार या मेहमान आने से यह रूटीन टूट जाता था टूट जाता था तब इन का हाल ऐसे नशेड़ी की तरह हो जाता था जो नशा ना मिलने पर बेबस टूटा सा पड़ा रहता है।

कनु  एक मध्यवर्गीय परिवार की बेटी थी । उसने कभी अपने आसपास या किसी सखी सहेली से भी इस तरह की कभी कोई बात न सुनी थी ना देखी थी । वह हैरान थी, कुछ दिन असहज होने के बाद अब उसमें जीवन जीने की लिप्सा बढ़ गई थी। उसे अपने पति पर गर्व था कि उसने उसे हर मायने में अपना जीवन साथी, हम निवाला, हम प्याला या कह लो पियक्कड़ बना लिया था अपने जैसा। जीवन की सच्चाई से वह अछूती थी। अभी अल्हड़ जवानी की उम्र थी, अच्छे बुरे की उसे पहचान नहीं थी।

घर में नौकर चाकर होने से काम भी कुछ खास नहीं था। समर के दोस्त की पत्नी सुनंदा उसे कभी कॉफी के लिए ले जाती थी या कभी शॉपिंग ले जाती थी अपने साथ। धीरे-धीरे कनु की सहेलियां  बन रही थीं। जयंत की पत्नी रुबीना ने उसे अपनी किटी का मेंबर बना लिया था। दंभ और दिखावे से वह परे रहती थी, लेकिन उत्सव प्रवीण मानसिकता से परिपूर्ण रहती थी। इस नई दुनिया को वह जी भर कर जीना चाहती थी।

सोचती थी कि वह किस्मत वाली है । समर के पास इतना पैसा है और वह उसे कभी रोकता -टोकता नहीं है । आए दिन सहेलियों के जमघट और  नई-नई सहेलियों से मिलना जुलना उसे बहुत भा रहा था। किसी प्रदर्शनी में ही तो मिली थी”महक”! काफी सुंदर और मस्त बिंदास थी। इन लोगों ने उसे कॉफी के लिए बुला लिया था अगले दिन। कभी-कभी वह भी इनके ग्रुप में शामिल हो जाती थी। एक दिन जब वह “कॉफी डे” पहुंची तो उसकी अलसाई और उनींदी आंखें देखकर रुबीना ( जिसे वह जानती थी) ने छेड़ा,

“क्या बात है महक, आज तो तुम्हारी आंखें कोई राज खोल रही हैं?”इस पर वह भी बिंदास मुंह बना कर बोली,

“वह कैनेडा से आए हुए हैं ना ,तो सोने नहीं देते हैं । पहले वह अपने को इंजेक्शन लगाते हैं फिर मुझे इंजेक्शन लगाते हैं। उसके बाद हम आपस में लग जाते हैं। तो बताओ कैसे सोना होगा ? दिन चढ़े तक ‘लाहा’ निकालते हैं!  क्या करूं ? जब सोएंगे नहीं तो आंखें अलसाई ही रहेंगी ना और खुल गए ना मेरे भेद सहेलियों में !”

उसकी बेबाकी पर यह सब सहेलियां एक दूसरे का मुंह ताकने लगीं ! कैसे अपने राज़ महफिल में खोल रही है! अजीब लड़की है !! दो-चार ने तो आपस में नजरें अदली- बदली करीं और उठके वहां से चली गईं। कविता ने तारा को आंख मारी, टेढ़ा मुस्काई और वह दोनों भी चली गईं। रुबीना तो यह सब होने के संताप में पानी- पानी हो रही थी। उसी ने महक को सबसे मिलाया था।

कनु को उसकी बातों में कुछ अधिक मस्ती और समर के साथ रिश्ते में आशा की कुछ नई किरणें नजर आ रही थीं। उसने देखा सब खिसक रही हैं, तो वह महक को पकड़ कर बैठ गई। कनु को इन बातों में बहुत आनंद आ रहा था। उस से कुरेद- कुरेद कर उसकी अंतरंग बातें पूछ रही थी और वह बिना झिझक सब बताए चली जा रही थी —बिंदास! अपने केनेडयन पति होने की शेख़ी में!! पंजाब की धरती पर विदेशी पतियों का होना, परिवार की लॉटरी निकलने के बराबर होता है। सारा परिवार विदेश के ख्वाब देखने लगता है उन्हें डॉलरों के रूप में नोटों के बंडल दिखाई देते हैं। कुछ ऐसा ही हाल था महक का।

कनु सोचने लगी कि प्रतिदिन समाचार पत्र में नशे की लत के बारे में ढेरों खबरें पड़ती है कि लोग नशे के लिए पान, गुटखा, गांजा ,भांग ,खैनी ,बीड़ी ,सिगरेट, हेरोइन आदि लेते हैं पर यह क्या नई चीज बता रही है!  मांजी बीमार हैं। हड्डियों की दर्द के कारण सो नहीं पाती है । उनके बदन की सारी हड्डियां दुखती है तो डॉक्टर की पर्ची के बगैर नींद की गोलियां मिलनी मुश्किल हैं। क्योंकि उन्हें भी नशा माना जाता है तो यह इंजेक्शन की क्या बात कर रही है ? उसने उत्सुकतावश महक से पूछ ही लिया कि वो ऐसे नशे वाले इंजेक्शन कहां से लेते हैं ?

इस पर वह अनजान सी बोली ,”मैं क्या जानूं ! मेरा पति लाता है कहीं से।  तुम्हें चाहिए है क्या ? कनु के मन के एक हिस्से को लगा कि उसने कैसे अपने स्वभाव विरुद्ध बात की है । इंसान बदनामी के भय से डरता है ना!  हालांकि महक के समक्ष यह आशंका निर्मूल थी । फिर भी कनु ने झट उसकी बात काट दी और  बोली,” मैं तो नॉलेज सेक पूछ रही थी।”

घर पहुंचने पर आज तो वह बहुत बेसब्री से समर के आने का इंतजार करने लगी और आते ही सबसे पहले उसे आज की यह घटना सुनाई। समर का ज्ञान भी ऐसी ही कुछ सुनी- सुनाई बातों तक ही सीमित था परंतु अब तो उसके भीतर कौतूहलता का बीज पनपने लगा था। उसे इस बात का कॉन्प्लक्स होने लगा था कि अपनी समझ में तो वह अपनी बीवी को सबसे अधिक आनंद दे रहा है —हमराज ,हमप्याला और हम निवाला बना कर ! लेकिन दुनिया में उससे भी बढ़कर लोग हैं । समर का तो चैन खो गया यह सब सुनकर।  वह इसी दुविधा में रहता था कि ऐसी अंतरंग बातों के लिए वह किस से पता करे और किसके पास जाए!

आखिर हिम्मत जुटाकर वह एक दवाइयों की दुकान पर गया और उसके नौकर को पैसे देकर पटाया । इस पर उस नौकर ने बताया कि फोर्टविन इंजेक्शन होते हैं और डिंपा भी होते हैं। पर जहां तक उसे ज्ञान था , उसके आधार पर वह बोला,” सुना है उससे कैंसर हो जाता है तुम सोच लो बाबूजी ! जुगाड़ तो मैं कर दूंगा । पर मैं फंसना नहीं चाहता हूं। कोडीन दर्द निवारक गोलियां है वह नशा कर देती हैं। वह दूं क्या ? ” यह सब सुनकर समर का मन नहीं माना और वह खोटे सिक्के की भांति वापस घर आ गया।

  •      उधर कनु ने भी कुछ करने की सोची और महक को फोन कर दिया और बातों बातों में उसे कहा कि उसे भी उस इंजेक्शन के दर्शन तो कराए । कैसा होता है! दोनों ने दोपहर को कॉफी डे पर मिलने का प्रोग्राम बनाया, जहां अपनी वफादारी का सबूत देने के लिए महक उसके लिए दो इंजेक्शन्स साथ ले आई थी। और मिलने पर उसे सारी विस्तृत व्याख्या समझाई । ड्रग्स बेचने वाले इसे बेचते हैं और कोई पुलिस में उनकी रिपोर्ट ना कर दे इस डर से यह चोरी-छिपे बिकते हैं।

इंजेक्शन के मिलते ही कनु की तो बांछें खिल गईं। वह अपने आप को सफल व कुशल अभिनेता समझने लग गई। काम इतनी शीघ्रता से और संतुष्टि से हो जाएगा यह उसकी सोच से परे था। वह महक को महंगे होटल में ट्रीट देने ले गई और वहीं अगले दिन दोनों ने लंच भी किया। सांझ ढले  समर अपनी तैयारी में था कि कनु ने उसे समूची घटना से अवगत कराया और इंजेक्शन भी निकाल कर दिखाए।  जिन्हें देखते हैं उस की आंखों में चमक आ गई और तय हुआ कि आज ही इनकी आजमाईश की जाए । आज कार में जाना कैंसल—और दोनों के चेहरे पर अर्थपूर्ण मुस्कुराहट आ गई।

कनु ने रसोई में जाकर मांजी की पसंद की चीजें बनाई और रामू जब खाना लेकर आया तो अपने हाथों से उन्हें खाना भी खिलाया।  मांजी बहू का आत्मीय व्यवहार देख कर आज बेहद प्रसन्न थीं और ढेरों आशीर्वाद देती रहीं। फिर दवाई लेकर आराम से बिस्तर में दुबक गईं। जब रामू भी ऊपर सोने चला गया तो मैदान साफ़ देखकर दोनों की उत्सुकता बेसब्र हो गई। उनके सपनों का क्षितिज अब एक रात के इंतजार मैं सिमट गया था।

दोनों के भीतर एक अजीब सा उन्माद आ चला था। घर में जब सुख- सुविधा के सभी साधन पर्याप्त मात्रा में हों तो चिंता या अवसाद का वहां लेश मात्र भी स्थान नहीं होता है इसके विपरित जिस तरह पांच सितारा होटल में जाकर रहना और घूमना फिरना और उससे भी बढ़कर ऐश कैसे की जा सकती है यह सब जानने की उत्सुकता इंसान की बढ़ती चली जाती है और पैसों के दम पर ऐश यानि गलत काम होते हैं क्योंकि उन्हें भी ऐसा ही कुछ नया करने का जोश होता है।  यहां भी यही सब होने चला था।

समर अत्याधिक जोश में था उसे कनु पर गर्व हो रहा था कि मर्द होते हुए वह जो कुछ नहीं कर सका वह कनु ने कर दिखाया था। दोनों ने डरते- डरते एक दूसरे को इंजेक्शन लगाया और इंतजार करने लगे कि देखें कैसी ख़ुमारी चढ़ती है या हमें  इस तरह के नशे का कैसा एहसास होता है लेकिन कुछ खास या सामान्य से बढ़कर विशेष जैसा कुछ भी नहीं हुआ।  हां, नींद आने पर वे दोनों सो गए ।

बस, इतना फ़र्क हुआ कि वह सुबह देर तक सोए रह गए थे और दोनों के सिर भारी थे। हां, सामान्य से हटकर कुछ घटा था —तो वह था इसके फल स्वरुप समर ऑफिस नहीं जा पाया था । उसे बाद में स्वयं पर गुस्सा आ रहा था। लेकिन कनु का अनुभव अलग था। वह घबराई हुई हट-हट और ऊई-ऊई कर रही थी। उसे लग रहा था कि उसे कीड़े- मकोड़े ,मच्छर,  छिपकलियां काट रहे हैं वह अपने बदन से उन्हें अलग कर रही थी जो वास्तव में वहां थे ही नहीं और हटाने के चक्कर में चीखने लग गई थी। समर ने घबराकर उसे बाहूपाश में जकड़ लिया और समझाया कि यहां कुछ भी नहीं है । दोनों बुरी तरह घबरा गए थे इस बुरे अनुभव से । जब कनु इस दु:सह अनुभव से बाहर लौटी तो दोनों बेहद डरे हुए थे वह इस अनाम परिवर्तन को कोई नाम नहीं दे पा रहे थे।

दोनों ने कसम खाई कि भविष्य में फिर कभी भी ऐसी कुछ भी आजमाईश नहीं करेंगे।  कनु का मन किया कि महक से बात करके पूछे लेकिन उसे महक पर बहुत गुस्सा आ रहा था और अपने पर भी ! वह शर्मिंदा थी कि अपनी प्रवृत्तियों को वह अपने वश में नहीं कर सकी थी।   कई दिन गुजर गए एक बार सहेलियों के जमघट में जाना हुआ तो वहां रितु से मालूम हुआ की महक दिल्ली गई है शायद अपने पति को छोड़ने क्योंकि वह कनेडा अकेला वापस जा रहा था। इस पर कनु ने सोचा अब तो उसका पति कनेडा चला गया होगा।  पर उसे कभी महक मिली ही नहीं। ना जाने वो कहां गुम हो गई थी।

लेकिन इस समाचार पत्र ने गुमशुदा की तलाश करके इन्हें होश में ला दिया था। दोनों एक दूसरों के नैनों में झांक रहे थे, मंद मंद मुस्कुराहट लिए।

वैसे भी कनु की शामें अब वैसी नहीं रह गई थीं। समर के दिमाग से अपनी पत्नी को दुनिया से अलग आनंद देने का भूत उतर चुका था। जो हो रहा था वही निर्विकल्प नियति थी।  वह दोनों अब सीधे-साधे ढंग से रहने लग गए थे। मांजी की इच्छा रंग लाई थी। डॉक्टर ने बताया कि वह प्रेग्नेंट है। मांगल्य , शुभ और शुभ्र से संचरित सहस्त्रों शुभाशीषों की गूंज वातावरण में घुल गई थी…!

डा. वीणा विज’उदित’

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

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