शब्दिकाएँ (१ भाग)

१–
नल खोलते ही
जल का शोर है
कुएं की
जगत पर
सूनी
पड़ी एक डोर है ।
२–
श्यामल घटाएँ
अलकों में समा
श्याम अलकों
को गिराएँ
निशा के मोहपाश में
बंधती जाएँ ।
३–
मसाइल पेश्तर (Issues पहले)
ऐेसे कभी न थे
जितने घने
पेड़ों के कुंज
उतने ही झरते
पत्तों के ढेर-
पतझड़ की है
कारस्तानी ।
४–
अपने जाए
हुए पराए
बेबस
किसे फरियाद सुनाएँ
आश्रमों वाले
दान से करें कमाई
पिंगलों के पल्ले
वो भी क्यों कुछ पाएँ..?
५–
ऐसा घेरा
शंकाओं की
फांस ने..
न दीन के रहे
न दुनिया के ।।
६–
बला की कशिश थी
आँखों में
आईना जो देखा
तड़क गया
बिखरे टुकड़ों में थीं
आँखें ही आँखें ।।
७–

फूले नहीं समाए
देख, बगिया खिली
वेश धरे फूलों के
नागफनियां थीं खिली ।।
८–
बारिशों का मौसम
तूफान की शक्ल
इख़्तियार करता
बाहर तो है
भीतर भी है
उफान मारती
तेरी यादों को
आख़िर
सँभालूं कहाँ…?
९–
धैर्य
समय है कम
कौन पढ़े
धीरज खोए
लम्बी कविता..?
भीतर के मर्म गढ़े
व्यंग्य लिए
मन के भीतर
संवेग जगाए
लघु कविता..!
१०–
जिस्म की
चारदीवारी में कैद
दर्द़ भरा आहों का
क़ाफिला
झरता आँखों से
दरिया बन
सब्र के समुंदर में
जा ठहरा है ।
११–
रूह के भीतर
छिपी ख़्वाहिशें
नित नए जामे पहन
बाहर निकल
मेरी बेचारगी का
परचम फहराती हैं
बेहतर होगा
इन्हें भीतर ही
बेलिबास रहने दूँ।।
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वीणा विज’उदित

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