मोह के धागे

शानी का मन आज किसी भी करवट चैन नहीं पा रहा था| अम्भुज एक हफ्ते के लिए विदेश चले गए थे| और राजू भी आज रात दोस्तों के पास रहने चला गया था |समस्या घिर आई कि घर में पसरे सन्नाटे को वो किस युक्ति से झेले? तो उसे याद आया कि वह कई बार सोचती थी कि कितने ही काम पडे हैं करने को ,कभी खाली समय मिले तो निबटाए |यह सोचते ही उसने टी वी का स्विच आँफ़ किया तो उसके नीचे की अल्मारी जो काफ़ी समय से बंद पडी थी, उसके भीतर से जैसे खटखटाने की आवाज उसे सुनाई दी| मानो इल्तज़ा कर रही हो,” आज मुझे खुली हवा में सांस लेने का मौका दे दो” | शानी ने झट उसके पल्ले खोल दिए | भीतर ढेरों सार्टिफिकेट्स, स्कूल-काँलेज के जमाने के एलबँम्स, सखि-सहेलियों के पत्रों के पुलिन्दे रिबन से ब्ँधे धूल-धुसरित हुए रखे थे | इस धारणा से कि फुर्सत में कभी इन मोह के धागों को अपने इर्द-गिर्द फिर बाँध लिया करेगी | क्या मालूम था कि वक्त, परिस्थितियाँ और प्रत्याशाएँ इन मोह के धागों का अस्तित्व ही नकार देंगीं| सो बरसों से जीवन की आपाधापी में यह वक्त कभी आया ही नहीं और आज इतने वर्षों पश्चात उसका मन मचल उठा है कि अब इसे संवार ही ले | जो लोग अविशिष्ट हो चुके हैं, जिनके सबन्धों के तार ना जाने कहाँ गुम हो चुके हैं- उनके पत्र अन्तिम बार पढ़ कर उनके मोह के धागे जो कभी उसके मन को बाँधे रखते थे, उनसे सदा के लिए निवृत्ति पा ली जाए| वह देख रही थी कि कुछ के तो परिचय भी यादों की परतों तले दब चुके थे| चेहरे अजनबी और संदर्भ तक विस्मृत थे| स्मृति का धरातल ही मानो बदल चुका था| तब का वक्त गया सो गया- अब के जीवन ने उस वक्त पर कोहरे का आवरण डाल दिया था| इतना घनत्व था कि कुछ धुँधला भी नहीं दिख पा रहा था| सो, सुरक्षित रखने जैसा उसमें कुछ बचा ही कहाँ था| उस विशिष्ट काल के सभी अपने लोग वक्त की पगडंडियों से गुजर कर ना जाने कहाँ-कहाँ समाए हुए थे अब |
खैर,शानी ने सारी फाइलें,एलबम्स,पेपरों के ढेर- कुछ बँधे हुए तो कुछ बोर्ड की क्लिप में फ्ँसे हुए सब निकाल कर बाहर अपने पलंग पर रखे|कुछ रसीदें और नाटक की स्क्रिप्ट्स भी थीं| उन्हें सामने पा अनुभवों के आवेग कुछ पाने को अधीर हो उठे | कई कुछ उमड़ता-घुमड़ता अतीत के द्वार से दस्तक देने लगा |कई कलाकार थे साथ में, ना जाने सब कहाँ- कहँ खो गए थे |सबके मध्य आत्मीयता थी, एक स्वच्छन्द अपनापन! असल में कलाकार सरसता के धरातल पर जीते हैं | इन्ही भावनाओं में डूबती- उतराती उसके हाथ अपनी शादी से पूर्व की ज़िपवाली डायरी आ गई | सबसे पहले वह उसी को खोल कर बैठ गई |मानो कारू का खजाना हाथ लग गया हो |उसमें काँलेज के जमाने में पुरस्कार पाती तस्वीरें, एक छोटी सी आँटोग्राफ बुकलेट और कुछ पत्र सहेज कर रखे हुए थे |उन्हें उठाते ही एक पांच बाये सात की फोटो अप्रत्याशित नीचे गिरी उसकी दुखती रग़ से उपजती | जिसे देखते ही उसके चेहरे पे अजीब सी चमक ने आधिपत्य जमा लिया |वह उसे ग़ौर से देख सोचने लगी |जब इसे सात पहरों में क़ैद किया था सबकी नज़रों से बचा कर इस ज़िप में, तब आहों का सर्द मौसम था |
अपराध -बोध तो कभी था ही नहीं |केवल थी भाग्य की चपल चाल |अब वैभव का होना या ना होना जीवन के इस मोड़ पर कोई महत्व नहीं रखता, फिर भी उसने सबसे छिपा कर उसकी तस्वीर क्यों सहेज रखी है |क्या उसे डर लगता है कि अम्भुज इसे देख लेगा–तो क्या सोचेगा? क्या अभी भी उसके दाम्पत्य जीवन में दरार पड जाने का उसे अंदेशा है ?यह भी तो हो सकता है तब उसके मोह के धागों से अभी वो विच्छिन्न नहीं हो पाई थी सो कमज़ोर पड़ कर घर के किसी कोने में जगह दे दी होगी |वह स्वयं ही इसे कभी देख नहीं पाई तो कोई और कैसे देखता |आज जब दिख ही गई है तो कितना कुछ तालाब की तलहटी से उठकर ऊपरी सतह पर दिखाई देने लग गया है |वह स्वयं से साक्षात्कार करने लगी—
अम्भुज के विदेश जाते ही उसने अपने अतीत को कुरेदने का कदम उठाया |क्या इसीलिए कि वह अपने वर्त्तमान को चिंदी-चिंदी होता नहीं देखना चाहती थी |मानो इस गोपनीयता को छूने और इसके सान्निध्य में बैठकर इसे दुलारने , मनुहारने के लिए उसे एकान्त की आवश्यकता थी | अब कुछ रातें उसकी अपनी हैं ,उन पर कोई जवाबदेही नहीं है |विहान का आगमन है कि रैन का बोझलपन क्या फर्क पडता है ?उसके अन्तस में उफनता आवेग सीमाएं तय नहीं कर पाया तो वह निश्चिंतता से भावों के आवेग में बहेगी – उतरायेगी |किसी के ख़लल डालने का डर नहीं है, ना ही विचारों के प्रवाह पर बाँध बँधने का या उघड जाने का |यह प्रक्रिया है उन स्मृतियों से बाहर आने की जो कब्र में दफ्न हो चुकी थीं और जिनका रिसना एक भावुकता मात्र था |
तस्वीर को उठाते ही शानी का हाथ काँप सा गया | मानो इसके उद्घघटन से उस पर लाँछनों की बौछार होने लगेगी |जबकि अम्भुज स्वभाव से ही मस्त है | उसने कभी ध्यान ही नहीं दिया कि वो क्या-क्या सहेजती है |पूर्णरूपेण विश्वास से भरा हुआ |फिर –उसका हाथ क्यों काँपा? उसका अपना अन्तरतल ही कमतरी के भाव से क्षीण हो चला है |स्पष्ट है कि इस कार्य में औचित्य नहीं है यह अनैतिक है |नहीं तो यदि ये इतना ही निरीह-निरापद होता तो अम्भुज के स्म्मुख भी किया जा सकता था |वो बात अलग है कि अम्भुज बहुत डिमांडिंग है |उसके रहते घर में समय ही कहाँ होता है कि वह कुछ स्वय्ं से बँधा भी खोलकर उसमे झाँक सके |यूँ भी कितना विशिष्ट है यह ख़्याल कि अपनी सत्ता को तो आगत की अन्तिम ऊँचाइयों तक तान कर रखना है लेकिन पिछले पहर की धूप के छींटे भी दिखाई ना दें |मानो सवेरा का उद्भव यही वर्त्तमान है |वैसे ही बैठी वह विचारों के उलझे धागे सुलझाने लगी |
किसी एक के विच्छिन्न हो जाने से जीवन तो नहीं समाप्त हो जाता | वैभव से संबंध बना, वो क्यों टूटा-यह कथानक तो उसके जीवन से जुडा है |मँझदार में डोलती नैया को साहिल पर लगाने तब उसका खेवनहार बन अम्भुज ही आगे आया था |अपने निश्च्छल प्रेम से उसने शानी को अपनी अंतरंगता के सूत्र में बाँध लिया था |जिस में किसी तरह के छल या असत्य का अस्तित्व नहीं रहता |तो फिर उसने वैभव की तस्वीर क्यों सहेज कर, छिपाकर रखी है ?आखीर क्यों—?अपने ख़्यालों के अँधड़ को वह आज रोक नहीं पा रही है | असमर्थता के आलम में वह उद्विग्न हो उठी |व्यतीत से एक दृश्य उसके समक्ष उभरा —
उसका दुपट्टा गुलाब की झाड़ी में फ्ँसने पर वैभव कह उठा था, “तुम काँटों से ही उलझने चली हो, सँभल सको तो सँभलो |”
उसके इश्क में दीवानी कहाँ भाँप सकी थी वो उसके इरादे ,बल्कि उसके नैनों के मोहपाश में बँधी झट बोल पड़ी थी, “काँटों में उलझकर ही तो फूल पा सकूँगी ना |”
प्रेम का तन्तुजाल बेहद नाजुक और कोमल होता है |विश्वासघात का एक ही झोंका उसे छिन्न-भिन्न कर देता है |वह दो नावों पर सवार होकर दरिया पर चलना चाहता था झूठ, छल और फ़रेब से लिप्त आश्वासन देकर और वह सत्य, निष्ठा और सादगी से उसे रुमानी उपन्यास की प्ंक्ति जैसा उत्तर दे आल्हादित हो बिन समझे काँटों की उल्झन को स्वीकार कर बैठी थी | कहाँ मिला उसे उन काँटों के मध्य खिला हुआ गुलाब? हाँ, अलबत्ता अति कष्टदायी थी काँटों की खरोंचें ; जिनसे लहू-लुहान होने पर अम्भुज ने उसके ज़ख़्मों को अपने प्यार के उत्ताप से सींचा और ता उम्र के लिए अपने बाहुपाश में गुलाब की कलियों जैसे सहेजकर प्यार की भीनी-भीनी सुगन्ध से सराबोर कर दिया था |अल्मारी से निकला सारा सामान उसके सम्मुख पलंग
पर बिखरा पड़ा था और वह मध्य में बैठी थी तस्वीर लेकर| अचानक उसने तस्वीर को बीच से दो टुकड़ों में फाड़ दिया |एक टुकड़ा उसने अपने दाईँ ओर तो दूसरा बाईँ ओर रख लिया |फटे टुकड़ों में एक-एक आँख भी बँट गई थी, जो उसे दोनो ओर से अपने घेरे में बाँध रही थीं–और वह शांत, निर्विकार सी अपनी प्रतिशोधात्मक प्रक्रिया से अन्तरतर में उग आए काँटों की चुभन को महसूस कर पा रही थी | इस हरक़त ने उसके होठों पर विजयी मुस्कान ला दी |वह वहीं तकिए पर सिर टिकाकर मुँदी आँखों से अतीत के जंग लगे बंद किवाड़ों को धकेलती भीतर घुसे जा रही थी |कितने ही सोपानों को लाँघता ,भटकता एक रूआँसा तात्कालीन विशिष्ट उभरने लगा था |जो हृदय के अतल गह्वर में अपनी सत्ता जमाए अभी भी था | अतीत का ऍतिह्य उद्विगनता का संचार कर पाता कि इससे पूर्व आँधियों का दौर चल पड़ा, जो सभी मूर्त-अमूर्त भावनाओं को संग ले उड़ चला इक अन्जाने सफ़र पर -जहाँ चेतना की दीवारें किरकिरा उठीं अनापूर्त ! संवेदनाएं आहत हो उठीं |
अपने पार्थिव शरीर को वहीं छोड़ वायु वेग सी अविरल धार बन बहती हुई बरसों से लम्बे अंतराल पश्चात वह एक तिलस्मी यात्रा पर अग्रसर थी |जहाँ नवीन आवृत्त बने थे-जिन्हे उसकी सोच ने बिसरा दिया समझा था |लेकिन यह क्या- यहाँ पार्श्व में दर्द भरा संगीत सुनाई दे रहा था |उसने वैभव को आवाज़ दी | क्षीण स्वर की गूँज वहाँ व्याप्त रुदन में गुम गई | उन हवाओं में चीखें थीं | सम्मुख काल का प्रतिरूप वैभव सफेद चादर में लिपटा धरती पर निःश्चल पड़ा था |यह देख वह आर्त्तनाद कर उठी थी| सदियों की छाती में चुभती पीड़ाओं का एहसास लिए वह चेतना में लौटी | उठ कर उसने देखा कि उसका तकिया आँसुओं से भीगा हुआ था |मानो आज उसने वैभव को अन्तिम विदाई दी हो |उस अध्याय की समाप्ति की हो |रात का अन्तिम पहर था और उसका कमरा बिजली की रोशनी से भरा था |यादों के घेरे से बाहर निकल उसने वैभव की तस्वीर के दोनो टुकड़े दोनो ओर से उठाए| पहले उन आँखों में काले मार्कर से काला रंग भरा फिर उनको चिंदी-चिंदी कर डाला| शायद उन नज़रों को सदा के लिए दफ्न करने के लिए-जिन्होने उसे कभी प्यार से भरमाया था , फिर जी भरकर रुलाया था | अपनी छाती की जलती हुई आग की परछाईं उसे कभी नहीं दिखी थी, पर आज उसकी बुझती राख पर वो संतुष्ट थी |
यथार्थ के धरातल पर लौटती वह अपने भीतर घटे हादसे पर चकित हो उठी | अपने विपन ,अविच्छन्न होते मन को तसल्ली दे-वैभव के व्यक्त अनुष्ठान से अब वह सदा के लिए बाहर आ गई थी | और उसके अन्तर्लिप्त मोह के धागों ने अपना स्वरूप बदल लिया था |

वीणा विज उदित
४६९ आर माँडल टाऊन
जलंधर-१४४००३

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