क्षणिकाएँ

कुछ लफ़्ज़ों को दी है दावत
ग़ज़ल बुनने का
ख़्याल लिए,
ग़र लब कर बैठे बग़ावत
तो ख़ामोशी से पी लेंगे
नम आँखों में उतरे ख़्यालों को ।
क्योंकि,
अश्कों की मय में डूबकर ही
मुकम्मल होंगे
ग़ज़ल के अशआर ।।
*
जज़्बात का आईना हैं
ये आँखें
दोस्ती की फितरत
आँखों से सीख यारा,
गमग़ीं हो दिल तो
बहती हैं आँखें
खुशी ज़ाहिर करती हैं
होठों संग आँखें !
*
सुन सहेली
ग़जब
पहेली
मैं
अपनो में
अकेली ??
* * * *
वीणा विज ‘उदित’

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