सलेटी बदलियां

सलेटी बदलियां

वादी में आए दिन हो रही वारदातों को सुन- सुनकर भय से जकड़े मन के दरीचे मानो सुबह की स्वर्णिम आभा से कुछ खिल से गए थे। सलेटी बदलियों से छाया अंधकार छंटता दिखाई दे रहा था , तभी तो ताहिरा की अम्मी हाथों में नुन चाय(नमकीन चाय) और गिर्दा (तंदूरी छोटी रोटी) लेकर आई और गहरे काले रंग के चट्टान नुमां पत्थर पर बैठ गई जहां उसके खाविंद अपने ख्यालों में गुम बैठे हुए थे । हवा में साथ बहते दरिया के पानी के शोर के साथ – साथ उनकी चाय की चुस्कियां का स्वर भी घुल रहा था। श्रीनगर से पहलगाम जाते हुए वहां पहुंचने से तकरीबन 10- 11 किलोमीटर पूर्व ही पहाड़ की तलहटी में दरिया किनारे सौ डेढ़ सौ घरों से आबाद एक छोटा सा गांव है “बटकुट” , जहां हर घर की खिड़की खुलते ही नदी का शोर भीतर के हर हिस्से पर अपना आधिपत्य जमा लेता है। पहाड़ी की ढलान पर कुछ पक्के घर जिनकी खपरैल व टीन की छतें हैं, अपने – अपने खेतों की हरियाली के मध्य सजे खड़े हैं । वहीं सांप सी रेंगती सिलेटी रंग की सड़क पहाड़ों के घनत्व को अपने से बांधती उत्तर की ओर पहलगाम यानी कि आखिरी पड़ाव तक बढ़ रही है । इसी सड़क के बाएं ओर घनी बस्ती है। तराई में बसी इस बस्ती के बाएं ओर लिद्दर दरिया पहाड़ों से गिरता-पड़ता आकर कुछ पल का चैन पाता है। फिर आगे बढ़ जाता है शोर मचाते हुए। बस्ती का पश्चिमी सिरा इसी दरिया की मस्त धाराओं से घिरा रहता है। वहां खेत ही खेत हैं, जिनके बीच-बीच में पक्के घर बने हुए हैं । खेतों की बाड़ के साथ-साथ “यईड़”( विलो ) के ऊंचे- ऊंचे वृक्ष हर खेत की शोभा हैं, जो हवा के साथ डोलते रहते हैं । इनकी पतली लंबी पत्तियां धूप में चांदी सी चमकती, हवा में लहराती अनुपम सौंदर्य बिखेरती हैं । कई खेतों की हदें पेड़ों की डालियों, टाट के टुकड़े, टीन के टुकड़े, लकड़ी के फट्टों और भारी-भरकम वादी के पत्थरों से भी बनी हैं। वहां सड़क किनारे पहाड़ों की तलहटी पर कई खेतों के किनारे अखरोट के पेड़ बहुतायत में हैं । यहां तक कि सड़क के किनारे घनी छांव देते अखरोट के पेड़ों तले कश्मीरी बालाएं और युवतियां बैठ कर गपशप कर लेती हैं। अखरोट के पेड़ किसी ना किसी की मिल्कियत होते हैं सो आम जनता इनको फलों से लगा देख कर भी किसी और के अखरोट नहीं तोड़ती । यह वहां का आम चलन है। बस्ती के करीब दो फर्लांग पहले ही “दारु -उल- उलूम” मदरसा है। यहां बच्चों को उर्दू व फारसी की आयतें पढ़ाई जाती हैं, और कुरान शरीफ की तालीम दी जाती है। फिज़ा में अच्छा खासा अमन-ओ-चैन है— कुदरत से मेल खाता। लेकिन 27 साल पहले जब से उग्रवाद ने कश्मीर में अपने जबड़े फैलाए हैं तब से आम जनता ज़हनी तौर पर डरी – डरी रहती है कि ना जाने कब यह भयंकर जबड़े उन्हें भी चबा डालेंगे … क्या मालूम? और वो किस शक्ल को इख़्तियार करेंगे ? मसलन, घर से नव जवान लेकर, जवान लड़की लेकर, धन दौलत लेकर या कोई और जुल्म ढा कर? वो भी जिहाद के नाम पर ! जबकि सच्चा जिहादी वही है जो भीतर के शैतान से जिहाद करता है। कुरान-ए-शरीफ का तो यही असूल है। लेकिन मुंह खोल कर कोई भी इस विषय पर नहीं बोलता हां, अलबत्ता उनकी रूह डरी और सहमी सी रहती है कि ना जाने कब यह लोग उनकी औलादों को बंदूक की नोक पर सरहद पार ट्रेनिंग पर ले जाएंगे और उनके पाक हाथों में “ए के ४७ ” थमा कर उग्रवादी बना देंगे!! सारी की सारी वादी स्वर्ग सी सुंदर होते हुए भी अपने सिर पर इन सलेटी बदलियों की छाया देखकर भीतर ही भीतर कराह रही है। हर शख्स यहां सच्चा मुसलमान बना फिरता है— पांच नमाज़ें पढ़कर और खासकर जुम्मे के जुम्मे मस्जिद में हाजिरी देकर अपने इर्द-गिर्द घूमते अनजाने दहशत गर्दों से बचे रहने का भरसक यत्न करता है। गुलबाबा एक पाक़ बंदे हैं खुदा के । वह भी सारे रोज़े रखते हैं हमेशा से ही। लेकिन हालात बिगड़ते देख कर वे मायूस हो बैठे रहते थे किसी सोच में डूबे ! ‌ हसीना बानो उन्हें कभी छोड़ती नहीं थी कि वह क्या और क्यों इतना सोचते हैं। आज भी हसीना बानो नुन चाय की चुस्कियां लेती गुपचुप बैठी रही पास। बस्ती से दो फर्लांग से भी पहले गुल बाबा ने चार एकड़ के सेबों के बाग के बीचों बीच अपना पक्का मकान बनाया हुआ है । पहाड़ के दामन से लेकर दरिया तक का कछार बहुत मीठे फल देता है । साथ ही घर के पीछे किचन गार्डन बनाया हुआ है । हसीना बानो का हसीन ख्वाब है वह सब्जियों का बाड़ा । बस्ती में तो आठ -दस दुकानें हैं रोजमर्रा की खरीदारी करने को एक ओर , बाकी मदरसे के पास पेंट की और गैस की दुकान भी है । एक बैंक भी है जिससे आगे है टीन का लाल छत वाला अधूरा मकान जिसकी बाउंड्री की टीन की खड़ी चादरों पर” एयरसैल ” ‌‌वालों ने अपने विज्ञापन छापे हुए हैं । जब 2014 में कश्मीर में बाढ़ आई थी तो केवल यही काम कर रहा था। मानो घर -घर पर अपना नाम लिखकर आड़े वक्त में उसने लोगों का साथ निभाया था। ख़ैर , काफी छाया है “एअरसैल” का नाम यहां पर। गुल बाबा के मकान के पीछे की ओर पहाड़ी नदी ढलान पर उतरती हुई कई बार रुख़ बदल लेती है । सो, उसकी तीन धाराएं बह रही है थोड़ी थोड़ी दूरी पर । उनके बीच की जमीन के टुकड़ों पर “यीड़” के पेड़ भरे हुए हैं। ये छोटे-छोटे नदी के द्वीप हैं। सूर्य की सीधी रोशनी पड़ने से पानी के साथ लुढ़कते आते पत्थरों से इन द्वीपों के तट चमचम चमकते हैं और इस ओर पानी का शोर भी तिगुना हो जाता है । घर में टीवी भी जोर से लगाना पड़ता है , नहीं तो दरिया का शोर ही अपना राग अलापता रहता है। दरिया के उस पार एक मील पर “मोहरा” गांव से गुल बाबा अपने बेटे सालिक के लिए बहू लाए थे शाजिया। वह बहुत सुंदर और सुशील थी । उसके आ जाने से ताहिरा को भाभी के रूप में सखी मिल गई थी । वह उसकी पढ़ाई में भी मदद करती और दोनों हाथ में हाथ डाले बाग़ की सैर भी करतीं। यहां तक कि दोनों लेट कर टी वी भी साथ ही देखतीं। इन दोनों को हंसी-ठिठोली करते देखकर अम्मी- अब्बू के चेहरे भी खिले रहते थे! सालिक “चेनानी हाइडल प्रोजेक्ट” में सरकारी नौकरी में था। वह घर आने के बहाने ढूंढता रहता और नई नवेली दुल्हन के साथ वीकेंड मनाने आता था। ताहिरा अभी पंद्रहवें साल में थी और “ऐश मुकाम” में बस द्वारा आठ मील दूर स्कूल जाती थी। ईद की छुट्टियां थीं। सालिक ईद पर घर आया हुआ था । सुबह उठकर उसने अम्मी अब्बू से कहा हम तीनों पहलगाम जा रहे हैं अपनी मारवती में (मारुति में) और रात किसी होटल में ठहर कर कल शाम को वापस आ जाएंगे। गुलबाबा ने खुशी-खुशी हसीना बानो को हिदायत दी कि बच्चों को टिफिन तैयार कर दो दरिया किनारे बैठ कर खाएंगे। ताहिरा दौड़ी आई और अब्बू के गले में झूल गई उनकी लाडो उनकी कमजोरी थी और उसे ₹100 का नोट पकड़ाते हुए बोले ढेर सारे आइसक्रीम के कोन खाना यह ले और दो घंटे में वे तीनों निकल गए पिकनिक पर। मौसम खुला था बाग में पेड़ों को देखते रहे —अभी छोटा-छोटा फल आया था । शाम ढले भीतर आ अपनी गद्दी पर बैठे और हुक्का सुलगवा लिया। हसीना बानो कश्मीरी गीत गुनगुनाती चूल्हे पर खाना बना रही थी। सालिक के आने से उसका सारा का सारा ममत्व खाना बनाने में दिखाई देता था । ढेर सारा रोगन जोश पक रहा था भत्त (चावल) और कड़म के साग के साथ चिकन बनाया गया था । दोनों ने खाना खाया और गुलबाबा पुनः अपनी मसनद के सहारे बैठ हुक्के की नीलचा को मुंह में डाले, गुड़गुड़ाने लगे । उन्हें लगा सेंक कुछ कम है वह नशा नहीं बन रहा तो थोड़ा तंबाकू डाल , दो दहकते अंगारे चूल्हे से हुक्के की चिलम में और डलवाए, फिर बैठ गए गुड़ गुड़ाकर सूटे लगाने। अपने परिवार में व्याप्त हंसी खुशी देख अपनी किस्मत पर वह स्वयं ही रश्क कर उठे । हसीना बानो से बोले जा रहे थे लेकिन वह तो उनकी बातों की लय में -हूं… हां करती कब नींद के आगोश में जा थमी, उन्हें पता ही नहीं चला। उन्होंने उस पर नजर डाली और मुस्कुराकर स्वयं भी बड़ा सा मुंह खोलकर जम्हाई ली , हुक्का हटाया और उसके हमबिस्तर हो गए। ठंडी जमीन पर पहले तिरपाल बिछा, उस पर कंबल, फिर दरी और उस पर नमदा (गर्म ऊनी कालीन) बिछाने के बाद बिस्तर लगता है कश्मीरी घरों में ! पलंग का रिवाज तो शहरों में अब चालू हो गया है। जूते- चप्पल घर के भीतर लाए ही नहीं जाते सो कालीन बिछे रहते हैं । ज़्यादातर कुशन दीवार के साथ रखे रहते हैं । गुल बाबा और हसीना बानो भी प्रथम पहर की गहरी नींद की एक झपकी अभी ले भी ना पाए थे कि बाहर से सांकल खटखटाने की जोर- जोर से आवाजें सुनाई दीं। दोनों ही नींद की कगार से बाहर निकल घबराए , ‘हे अल्लाह, रहमत करना हमारे बच्चों पर।’ हंसी ना बानू ‘ला , इल्लाह – इल्लाह अस्तक -फ्रू- अल्लाह ‘ कलमा पढ़े जाने लगी। गुल बाबा ने किसी भावी आशंका में दरवाजे की ओर क़दम बढ़ाए क्योंकि आज बच्चे जो बाहर गए थे —उसे उनके साथ कुछ अनहोनी घटने का भय था! ख़ैर, जैसे ही अंदर से कुंडी खोली तो किवाड़ खुलते ही सामने बड़ी-बड़ी बंदूकें थामें कुछ लोग उसे भीतर की ओर धकेलते घर के भीतर घुस आए। हसीना ने बत्ती जला दी थी तब तक । रोशनी में अपने खाविंद(पति) ‌को पिस्तौलों से भीतर धकेलते कुछ अनजाने लोगों को देखकर वह ज़ोर से चीखी और थर-थर कांपने लगी। तभी पीछे से एक बंदूकधारी ने आगे बढ़ अपना गंदा बदबूदार हाथ उसके मुंह पर रखकर उसकी आवाज बंद कर दी । वैसे भी उस बियाबान में व घर में भी कोई और व्यक्ति ना होने के कारण उस बेचारी की चीख़ दरिया के पानी के शोर में दब कर रह गई थी। तीसरा बंदूकधारी बड़े रूआब से सब को पीछे से भीतर धकेलता गुर्राया , ” जल्दी कर, कुछ खाण को रख । बहुत भुक्ख लगी है।” वे तीनों पहनावे से अफगान लग रहे थे। उनका रंग रूप डील – डौल लंबा ऊंचा था और पहरावा कश्मीरी उग्रवादियों या जिहादियों से अलहदा था। मज़हब के लिए मर मिटने का जज़्बा तो कहीं था ही नहीं। यह दहशतग़र्द सरहद पार के लग रहे थे। ख़ैर, हसीना बानू को क्या खबर थी कि आज वह इतना स्वादिष्ट ढेर सारा सालण (खाना) इन अल्लाह के बंदों के लिए बना रही थी ! भूखे की भूख मिटाना तो सवाब ‌है । ‌ यह सोचकर उसने बुझे मिट्टी के चूल्हे में फटाफट बालण डालकर पीपणी से फूंक मारी । आग भकाभक जल पड़ी और उसने चावल चढ़ा दिए। साथ ही लगी आधी अंगीठी के सेंक पर सालण गर्म करने को रख दिया। भूख की बात सुनकर गुलबाबा भी संयत हो गए थे । वे आगे बढ़कर तीनों के हाथ धुलवाने लगे । खौफ ज़दा होते हुए भी बहुत सलीके और इज्जत से हसीना बानो ने स्टील की थालियों में उन्हें भत्त और भेड़ू के गोश्त का सालण परोसा । वे आपस में पश्तो में कुछ बातें कर रहे थे। खाना खत्म होने पर हाथ धुलवाए। तीनों ने हुक्के की चिलम फिर सुलगवाई और बारी-बारी से कश ‌खींचे । जोर से डकार लेते हुए तीनों ने अपनी बंदूकें कंधों पर डालीं। आंधी की तरह वे आए थे तूफान की तरह घर से बाहर निकल गए । शायद दूर अंधेरे में पेड़ों के झुरमुट में उनकी गाड़ी खड़ी थी छिपी हुई , क्योंकि रात के सन्नाटे को चीरती उसके स्टार्ट होने की आवाज आई और फिर गुम हो गई। उनके बाहर जाते ही गुल बाबा ने सांकल लगाई और ऊपर वाले का शुकराना किया । हसीना बानो तो जलता चूल्हा वैसा ही छोड़कर उनसे आकर लिपट गई थी। अब दोनों खुदा का शुक्र कर रहे थे कि इतने में ही बच गए। वह सुना करते थे कि उग्रवादी या जिहादी सरहदी इलाकों में आधी रात को खाने – पीने वहां के घरों में आया करते हैं। और रात का अंधकार बढ़ते ही यह दहशत वहां के घरों में समाई रहती थी । लेकिन आज की रात उनके साथ यह वाक्या गुजरा तो उन्हें उन लोगों का दर्द पता चला । ‌ दोनों लिहाफ ओढ़े बैठे रह गए थे। नींद तो कोसों दूर चली गई थी। पास की मस्जिद से अज़ान की आवाज आई तो नमाज़ अदा कर शायद बैठे-बैठे दोनों ने एक झपकी ले ली। मानो खुदा ने अपनी रहमत का हाथ उनके सर पर रखा हो। अब सुबह की स्वर्णिम बेला में दोनों के दहशत से जकड़े मन के दरीचे कुछ खुल गए थे। दोनों ने तय किया कि गुज़िश्त रात (बीत गई) का ज़िक्र वे कभी भी , किसी से भी नहीं करेंगे। दोनों ने इस घटना पर मुंह सी लिया। खुदा की बंदगी करी कि खुदा ने उन दरिंदो से अपने बंदों को अपनी रहमत में ले लिया था। उधर दिन बीता तो शाम ढलते ही तीनों बच्चों की कार आ गई। उनके उल्लासित चेहरों पर खुशियां बिखरी देखकर यह दोनों भी खूब खुशी जताने लगे । बच्चों को लगा कि अम्मी – अब्बू भी पीछे से खूब मस्त रहे । उनकी बनावटी हंसी ज्यादा ही बिखर रही थी क्योंकि जब हम किसी से कुछ छिपातें हैं तो कुछ ज्यादा ही दिखा जाते हैं । ख़ैर, अगले दिन सालिक को वापस ड्यूटी पर जाना था , उसे हंसी- खुशी सब ने विदा कर दिया । जिंदगी आम चल पड़ी । शाजिया और ताहिरा आपस में चुहलबाज़ी कर रही थीं। अपने पहलगाम ट्रिप से बेहद उत्साहित हो ताहिरा अम्मी- अब्बू को भी ढेरों किस्से सुनाती रही । ” चार बार आइसक्रीम कोन खाए और अब्बू के पैसे बचा लाई ।” कहकर उसने अब्बू का सौ का नोट उन्हें दिखाया। अब्बू की दुनिया उनकी बेटी में समाई हुई थी! शैतान ! कहकर वे हंस दिए। दो-चार दिनों में दहशत की संजीदगी थोड़ी हल्की पड़ गई थी । मानो एक बुरा ख्वाब डरावना – सा आया था, जिसकी तासीर अब मिट गई थी। दोबारा से नींद ने आंखों में बसर कर लिया था । पहले की तरह ही जीवन अपनी धुरी पर चल पड़ा था कि 10 दिनों बाद फिर रात के भयावह सन्नाटे को चीरती वैसी ही सांकल की ठक-ठक दरवाजे पर हुई । गुल बाबा और हसीना बानो के काटो तो खून नहीं । हसीना बानो ने वहम के मारे जरूरत से ज्यादा खाना बनाना ही बंद कर दिया था कि कहीं वे फिर ना खाने आ जाएं । बेटी और बहू एक ही कमरे में टीवी पर अपना पसंदीदा प्रोग्राम देख रही थीं। भीतर टीवी का शोर बर्फीले पहाड़ों से उतरते दरिया की चीखती आवाज में गुम था । बर्फीले पहाड़ों के पीछे सूरज के सरकते ही मानो ठंड से कांपते बदन , जमीन और आसमां भी थम कर शांत हो जाते हैं ,सो ऐसे ठहरे हुए सन्नाटे में ठक ठक की थाप…! गुलबाबा ने अपना लिहाफ फेंका और लपक लिए दरवाजे की ओर। दहशत से स्नायु वेग की अधिकता थी व हाथों में कंपन ! शुबहा सही निकला , सामने वही दरिंदे थे। छै: फुट ऊंचा आदमी सलवार- कुर्ते के ऊपर वास्केट पहने हुए , हाथों से कंधे की ए के-47 राइफल संभाले मैला- कुचैला साफा बांधे हुए गुल बाबा को धकेल ता हुआ भीतर आते ही बोला ,”कहां है तेरी जनानी ? उसनूं बोल खाण लई दस्तरखान लगाए। उसके पीछे वही दोनों उसके साथी थे । बोले उन्हें बड़ी भूख लगी है। हसीना बानो झट से सिर पर कपड़ा बांध चूल्हे की ओर दौड़ी। भत्त बनाने को और पिछले भीतरी चूल्हे की लपटों पर कड़म का बैंगन वाला साग जो बचा था, गर्म करने को रख दिया । खाना बनाने में समय लगता देखकर वे भीतर की ओर चल पड़े । यह देख, गुलबाबा ने उन्हें रोकना चाहा तो उन्होंने गुल बाबा को जोर का धक्का देकर पीछे धकेला। इस उठा -पटक की आवाज को सुनकर ननद भाभी ने पलट कर अपने दरवाजे की ओर देखा , तो उन लोगों को सामने देखकर उन दोनों की चीखें निकल गई। और वह एक दूसरे से भय के मारे लिपट कर रोने लगीं। वह चिल्ला रही थीं “अम्मी! -अब्बू”! उधर टी वी की आवाज में उनकी चीखें दूध में पानी सी घु ली जा रही थीं। वे सरकती हुई पीछे की ओर दीवार भेदकर उस में समाने का यत्न करने लगीं और कि तभी लार टपका ते वहशी दरिंदे वापस मुड़ आए । वे बाकी कमरों में भी जांच पड़ताल करने गए —वहां और कौन हैं ! और उधर चूल्हे की आग उनकी उदाराग्नि को मिटाने के लिए तत्पर थी। बेचारी हसीना बानो की आंखों से घबराहट, डर और दु:श्चिंता के कारण आंसू बहे जा रहे थे । हाथों से बर्तन छूट रहे थे। वह खुदा की बंदगी में कलमा पढ़े जा रही थी । ‘ला -इला-ह- इल्लाह अस्तक -फ्रू- अल्लाह'( हे खुदा मेरे गुनाह बख्श)! वे तीनों अब अपनी नकाब हटा चुके थे। उन्हें समझ आ गया था कि यहां कोई खतरा नहीं है । गुल बाबा दस्तरखान बिछा रहा था और सोच रहा था कि कैसे इन बद्जातों की आंखें नोच ले ,जो उसके घर की इज्जत पर उठी थीं । धिक्कार रहा था वह अपने नेताओं को, जो शुतुरमुर्ग बने बैठे थे। जिन्हें आम जनता पर हो रहे जुल्म का इल्म होते हुए भी , चैन की नींद आ जाती थी। सी आर पी एफ जगह-जगह तैनात थी , फिर भी बाहरी ताकतें घाटी में क्रियाशील थीं। ढेरों उग्रवादी संगठन थे जैसे हिजबुल मुजाहिदीन, जम्मू कश्मीर लिबरेशन फ्रंट, हुर्रियत नेता ऑडी जिन्होंने कश्मीर घाटी का लूटा हुआ है । राष्ट्रीय राइफल्स के आने से कुछ फर्क पड़ेगा , लोग सोचते थे । पर कहां है अमन…? उधर दोनों लड़कियों ने डर के मारे भीतर से कुंडी बंद कर ली थी, लेकिन रो-रोकर बुरे हाल थे उनके । यह इलाका सुनसान था , बस यही गलत था। ख़ैर, खाना परोसा गया उन्होंने खाना खाया। डकार लेकर उठे और बंदूक की नोक पर गुल बाबा को कहा, ” तुम बाहर खड़े होकर पहरा दो , हमने चिलम के कश लेने हैं।” गुलबाबा ने सोचा कि ये लोग पहले की तरह चले जाएंगे। सो, वह बाहर खड़ा हो गया । उन्होंने भीतर से कुंडी लगाई और हसीना बानो से शाजिया और ताहिरा के कमरे की कुंडी खुलवाई। इन तीनों ने उन तीनों औरतों के हाथ-मुंह वहां रखे दुपट्टों से बांध दिए। और एक-एक को लेकर तीनों एक-एक लिहाफ में घुस गए। उधर गुलबाबा इस घटना से बेखबर अपनी लाचारी पर स्वयं के बाल नोच रहा था। अपनी छाती पर दोहत्थड़ मारता हुआ बुदबुदा रहा था , “हे खुदा मुझे मर्द क्यों बनाया? मुझ में इनसे मुकाबला करने की हिम्मत बख़्श या अल्लाह रहम कर!” वह दरवाजा खटखटाने लगा जोर- जोर से। भीतर तो कोई नहीं सुन रहा था , अलबत्ता बाहर सड़क पर निकली गश्त की टुकड़ी ने कुछ सुना और आवाज की ओर राष्ट्रीय राइफल्स के 10 जवानों की टुकड़ी चुपचाप वहां आ पहुंची। आते ही कैप्टन ने पूछा , “भीतर कौन है ? क्या बात है? तुम डरे हुए हो और बाहर क्यों हो ? मानो खुदा ने गुल बाबा की फरियाद सुन ली थी । वह बोला, ” जी ,भीतर घर की औरतें सो रही हैं और ररर…रो पड़े !” इतना सुनते ही गुल बाबा के हाव भाव से मामला संदिग्ध जानकर किसी तेज औजार से उन्होंने दरवाजा खोल लिया और बिना एक मिनट गंवाए, दबे पांव से वे बारी- बारी भीतर घुसे। सामने पड़ी तीन ए के ४७ राइफल्स देखकर एक्शन में आ गए पहले तीनों राइफल्स कब्जे में करें फिर जो कन्ने हो इशारे से भीतर झांकने लगे देखते हैं कि 3 लिखा बिना आवाज की डोल रहे हैं स्पीड में मामला समझने में देर नहीं लगी और उसी शान उन तीनों ही हाथों को गोलियों की बौछार ओं से छलनी कर दिया गेहूं के साथ घुन भी पिस गया गुल बाबा पीछे खड़े सब देख रहे थे उनकी शान से मानो वही थम गई थी आंखें फाड़े वह जो मंजर देख रहे थे अपने आशियाने के लूटने का …वह बयां होना मुश्किल है! वे वहीं निढाल हो जमीन पर गिर गए। जब जवानों को तसल्ली हो गई कि काम हो गया है तो कुछ एक ने आगे बढ़कर उनके लिहाफ नीचे की ओर सरकाए। उस एक पल के नजारे ने दुनिया के सारे रब्ब, भगवान, वाहेगुरु… को वहशी इंसानों की दरिंदगी पर शर्मिंदा कर दिया। गोलियों से सब के अंग -प्रत्यंग छितरे पड़े थे बहते आते लहू के दरिया में!!! वज्र प्रहार से तो अभेद्य चट्टानें भी टूट कर बिखर जाती हैं— फिर यह तो गुल बाबा का दिल था, जो इस भीषण आघात से क्षत-विक्षत हो विदीर्ण हो गया था। उनका दिल विद्रोह कर उठा ।उन्होंने जवानों के जाते ही बकरा हलाल करने वाला चाकू उठाया और भीतर जाकर उन तीनों दरिंदों के सिर एक झटके में उनके धड़ से अलग कर दिए और अट्टहास कर कर उठे जोर-जोर से। इस वक्त वह एक सताया हुआ इंसान था ना कि हिंदू या मुसलमान! खून से लथपथ तीनों मुंडो ( सिरों ) को हाथों में उठाए —स्वयं भी खून से भीगते हुए , वह बस्ती के चौंक की ओर भागे। चौराहे पर उन तीनों के मुंड फेंक कर वह जोर-जोर से अल्लाह -हो- अकबर , अल्लाह -हो-अकबर पुकारने लगे। दर्द में भीगी चीखती आवाज सुन बस्ती के सारे दरवाजे और खिड़कियां फटाफट खुल गए…! पौ फटते ही वहां की सुबह कराह रही थी क्योंकि घाटी पर छाई दहशती सलेटी बदलियों ने धवल शिखरों को ढंक कर उनका अस्तित्व ही नकार दिया था।

वीणा विज’उदित’

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